Sunday, March 29, 2026
"लिफ़ाफ़ा"- मुबारक
ये दोनों खूबसूरत किताबें हाल फिलहाल में की गई मेरी तिरुपति की यात्रा की साथी रहीं। मनीष-सिल्फ़ द्वारा लिखी "लिफ़ाफ़ा" दो अनजान प्रेमियों के बीच साझा किए गए खतों का एक अनूठा संकलन है, जो पारंपरिक उपन्यास न होकर प्रेम, संवाद और खामोशी की गहराई में उतरता है। इसमें कश्मीर की झलक और उर्दू का खूबसूरती है। यह किताब मनीष और सिल्फ के पत्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्होंने कभी एक-दूसरे को नहीं देखा लेकिन खतों के माध्यम से इतने गहरे जुड़ गए कि विवाह के जरिए दोनों "मिट्टी और आसमान" एक हो गए। दोनों लोगों ने साहित्य, जीवन, रूढ़ियों, अवसाद, कविता, फिलॉस्फी, सरकार, राजनीति, स्त्रीवाद आदि पर बातें की हैं। 'लिफ़ाफ़ा' और ' लिफ़ाफ़ा मुबारक' दोनों ऐसी किताबें हैं जो आपको डिजिटल दुनिया में पुरानी चिट्ठियों वाले दौर का एहसास कराती है, जो आधुनिक प्रेम की परिभाषा को नया रूप देती है। "लिफाफा" में शादी के पहले के खत हैं और "लिफ़ाफ़ा मुबारक" में शादी के बाद के। दो सादे लोग जब साथ आते हैं तो उनकी सादगी दुनिया को जादुई तिलिस्म-सी लगने लगती है। क्योंकि सरल होना बहुत कठिन है। ये सामाजिकता का दबाव आपको इस सादगी वाले जादू से वंचित कर देता है। सच कहूं तो 'लिफ़ाफ़ा' किताब के बारे में सुना बहुत था, लेकिन पढ़ने का मौका नहीं मिल पाया। एक दिन अचानक से मेरी इंस्टा फीड में मनीष जी का एक पोस्ट आया, जिसमें उन्होंने त्यौहारों में अपनी कम रुचि के बारे में लिखा था। मुझे उस पोस्ट का कैप्शन पढ़कर अपने किसी परिचित की याद आ गई। उन्हें भी सामाजिकता के दबाव से सख़्त नफ़रत है। जिज्ञासा बढ़ी। मैं प्रोफाइल पर गई। तब पता चला कि ये पेज तो मनीष जी का है।हैं। मैंने कई पोस्ट देखें। सभी में आपका लिखा पढ़ा। सिल्फ़ जी के बारे में भी थोड़ा बेहतर तरीके से जान पाई। कई बातों से रबता महसूस हुआ। विचार मेल खाए और बिना समय गंवाए फॉलो कर लिया। आपकी हाल में ही आई "लिफाफा मुबारक" की बुक लॉन्च पर आप दोनों को सुना। फिर एक पॉडकास्ट में आपका इंटरव्यू सुना। विकलांगता और कई सामाजिक रूढ़ियों पर आपका बेबाकी से बोलना बहुत ही सराहनीय लगा मुझे। यूं कहिए प्रशंसक बन गई आप दोनों की। कहते हैं कुछ किताबें आपके जीवन में तब आती हैं, जब आपको उनकी सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। इसमें लिखी कई को मैंने जिया है। ये दो लोग आपकी नज़र में आम लेखक हो शायद। लेकिन ये दुनिया को बदल देने की हिम्मत रखते हैं। रूढ़ियों के खिलाफ बोलते ही नहीं, उन्हें तोड़ते भी हैं। मनीष जी स्वयं को त्रासदी से उपजा लेखक कहते हैं। शायद कुछ लोगों को ये किताब उतनी दिलचस्प न लगे, लेकिन फिर भी मेरे हिसाब से आप सभी को ये दोनों किताबें पढ़नी चाहिए, जिन्हें ऐसे सभी मुद्दों पर बात करना पसंद है जिनपर अक्सर चर्चा नहीं होती है या आपके इर्द गिर्द ऐसे लोग नहीं होते हैं, जिनसे आप एक हेल्थी डिस्कशन कर सकें। मुझे ये दोनों किताबें बहुत पसंद आई, ख़ासकर लिफाफा। आपकी आनेवाली किताबों का इंतजार रहेगा।
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