बेबी अपनी जगह सही थी और डी०डी० भी। लेकिन जैसा कि किताब में भी एक जगह लाइन आती है -" सभी निर्णय गलत निर्णय होते हैं, किसी - न - किसी संदर्भ में, किसी न किसी के संदर्भ में। हमें वही निर्णय करना चाहिए जो हमारे अपने लिए हमारे विचार से सबसे कम गलत हो।" और कम गलत निर्णय वही होता अगर दोनों विवाह की सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ जाकर अपने जीवन के फैसले लेते। थोड़ा इंतजार, थोड़ा धैर्य और थोड़ा संयम जीवन की कायापलट सकता है। लेकिन अगर कहानी में सब कुछ आपके और मेरे हिसाब से होने लगे तो कहानीकार का काम ही क्या रह जाएगा। कुछ ऐसे ही उतार चढ़ाव चलते हैं इस कहानी में। डी०डी० कई जगह कमजोर पत्र के रूप में प्रकट हुआ है। उसे अपने त्रासदी भरे जीवन से कुछ ज्यादा ही लगाव रहता है। उसे लोगों की सांत्वना की आदत पड़ चुकी है। इसलिए शायद उसे बेबी के प्रेम भी सांत्वना लगता है। उसे लगता है कि उसकी इस सांत्वना वाली प्रवृत्ति का बेबी भी हिस्सा बने। परन्तु बेबी भले ही अल्हड़ थी लेकिन अपनी बात को दो टूक शब्दों में बेझिझक रखना उसे सभी से अलग बनाता था। डी०डी० विफल हुआ। वह विफल हुआ अपने प्रेम की प्रामाणिकता देने में। बेबी को समझा पाने में कि उसका ऐसा निर्णय उन दोनों के भावी कल के लिए कितना आवश्यक है। बेबी को उसके अमेरिका जाने की बात समझ में आती नहीं, खासकर जब उसे अपने माता पिता की अनुमित मिल गई( जो पहले इस विवाह के पक्ष में नहीं थे)। बेबी को अपना सपना पूरा होते दिखता है। उनकी ज़िन्दगी अब साथ गुजरने वाली है, एक हो कर! वह उसे रोकने की कोशिश करती है, पर असफल होने पर ख़त्म कर देती है उससे रिश्ता! बेबी जिसने आपने आप को डी०डी० की ब्याहता मान लिया था, अब अपने आप को उसकी विधवा मान बेबी से मैत्रेय, मैत्रेय से विदुषी मैत्रेय, बनने की राह पर अग्रसर हो जाती है, खो देती है अपने आप को किताबों और पठन पाठन में। मेरे हिसाब से कई रिश्ते इस अमेरिका जाने, कुछ नया बन जाने की बलि चढ़ गए हैं। लेकिन क्या ऐसी स्थिति में भावनाओं में न बहकर एक परिपक्व निर्णय नहीं लिया सकता? क्या जो भी फैसले उन दोनों ने लिए, वो सुख दे पाए दोनों को?इसका जवाब ही है उपन्यास का शीर्षक 'कसप'!!
जब आप इस किताब को पढ़ेंगे तो स्वयं ही अपने जीवन अनुभव के आधार पर कई आशय निकाल सकेंगे इस कहानी का। हर कहानी को पाठकों के कई निष्कर्षों की आवश्यकता होती है..उसकी सार्थकता प्रमाणित होने के लिए। अगर आप मुझसे पूछे कि इस किताब को पढ़कर मुझे कैसा लगा तो शायद मेरा भी यही जवाब होगा - "क्या जाने!"
हर किताब के कुछ उद्धरण होते हैं जो लेखक के सुंदर लेखन को प्रमाणित करते हैं। "कसप" से ऐसे कैसी उद्धरण जो मुझे पसंद आए, निम्न हैं -
🌼"स्वार्थ सदा परमार्थ बोलता है। जो कहते हैं कि हम सब ये तुम्हारी भलाई के लिए कर रहे हैं, वह यह भी कह रहे होते हैं कि तुम्हारी भलाई में ही हमारी भलाई है।"
🌼"सभी निर्णय गलत निर्णय होते हैं, किसी - न - किसी संदर्भ में, किसी न किसी के संदर्भ में। हमें वही निर्णय करना चाहिए जो हमारे अपने लिए हमारे विचार से सबसे कम गलत हो।"
🌼"अब वह उदास ही नहीं, आहत भी था। उदास और आहत, दोनों होना, उसे कुल मिलाकर प्रेम को परिभाषित करता जान पड़ा।"
🌼"एक उम्र होती है आहत होने की और वे उस उम्र में पहुंच चुके हैं। उस उम्र के बाद और उस चोट के बावजूद तमाम और जिंदगी होती है, इसीलिए लेखक होते हैं, कहानियां होती हैं।"
🌼"मुझे किसी के लायक नहीं बनना। अपने लायक ही बन जाऊं बहुत होगा। तू किसी के लायक क्यों बनना चाहता? तेरे भीतर सभी गुन ठहरे। तू अपने लायक जो बनना चाहेगा तो कितना बड़ा जो आदमी नहीं बन जाएगा?"
🌼"जिन्दगी की घास खोदने में जुटे हुए हम जब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं, तभी प्यार का जन्म होता है।"
🌼"अकेलेपन में भी कुछ है जो नितांत आकर्षक है, सर्वथा सुखकर है। लेकिन अफसोस कि उसे पा सकना अकेले के बस का नहीं!"
🌼"अगर मानवीय तर्क ही हैं तो प्रेम के लिए दो में से एक की बलि अपेक्षित है। प्रश्न यह है कि तू उससे प्रेम करता है या कि तू चाहता है वह तुझसे प्रेम करे?"
🌼"आप जानते हैं, स्वीकारते हैं नि:श्वास छोड़कर कि यह मैत्रेयी का बाल-हठ नहीं, तिरिया- हठ नहीं, अस्तित्व-हठ है।"
🌼"मैं सोच रहा हूँ कि जिसे तुम अन्तरंगता कहती हो वह प्यार के बिना कैसे हो सकती है? प्यार से भिन्न कैसे हो सकती है?”
“प्यार दाता या भिखारी होता है। अन्तरंगता कुछ माँगती नहीं। दे रही हूँ औघड़दानी बनकर, इस भाव से कुछ देती नहीं। और हाँ, अन्तरंगता को बिना माँगे कुछ मिल जाये तो वह धन्य भी नहीं हो जाती।”
“प्यार भी कुछ नहीं माँगता।”
"सिवा इसके कि कृपया मुझे स्वीकार किया जाये! नहीं करोगे तो एक गरीब मारा जायेगा। प्यार लिप्सा और वर्जना के खानों पर जमाने-भर के भावनात्मक मोहरों से खेली जानेवाली शतरंज है। अन्तरंगता खेल नहीं है, उसमें कोई जीत-हार नहीं है, आरम्भ और अन्त नहीं है। प्यार एक प्रक्रिया है, अन्तरंगता एक अवस्था।"
🌼"प्रेम के आनन्द को प्रेम की पीड़ा से अलग नहीं किया जा सकता। नित्य संयोगात्मक है प्रेम, और नित्य वियोगात्मक। देखिबौ जहाँ विरह सम होई, तहाँ कौ प्रेम कहा कहि कोई।
नायक ने लिखा कि कदाचित् चिर-अतृप्ति ही प्रीति है। प्यास ही प्यार है। प्यारी जू को रूप मानो प्यास ही को रूप है।
नायक ने जानना चाहा कि यदि प्यार, प्यास ही है तो क्या प्यास का बुझ जाना प्यार का मर जाना नहीं है? क्या कोई खाँटी प्रेमी इस उद्देश्य से प्रेम कर सकता है कि प्रेम को अन्ततः मार दे? क्या असली प्रेमी, प्यास की विह्वलता बढ़ने से विचलित हो सकता है? क्या वह नहीं जानता कि इस प्यास का समाधान अतिरिक्त प्यास है? प्यार की पीड़ा का उपचार और अधिक प्यार है?"
🌼"क्या हम मानव एक-दूसरे को दुख-ही-दुख दे सकते हैं, सुख नहीं? हम क्यों सदा कटिबद्ध होते हैं एक-दूसरे को गलत समझने के लिए? इतना कुछ है इस सृष्टि में देखने-समझने को, फिर भी क्यों हम अपने-अपने दुखों के दायरे में बैठे रहने को अभिशप्त हैं? अगर हम खुशियाँ लूटना-लुटाना सीख जायें तो क्या यही दुनिया स्वर्ग जैसी सुन्दर न हो जाये?"
🌼"जीवन में क्या क्या नहीं होता है, यह जानते- समझते जिज्ञासुओं का पूरा जीवन बीत जाता है। विविध है, विचित्र है, मायावी है जीवन।"
🌼"नर के लिए प्यार का उन्माद वहीं तक होता है, जहॉं तक कि वह स्वीकार न हो जाएI उसके बाद उतार ही उतार है। उधर मादा के लिए उसकी उठान ही स्वीकार से आरंभ होती है।"
Best one.❤️.
ReplyDeleteजब भी इस Book के बारे मे सोचतें हैं, ‘जिलेम्बू’ शब्द याद आता है तो होठो पर मुस्कुराहट तैर जाती है
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